स्वास्थ्य

एक जोड़ी पैर: मुंबई में महिलाएं, काम और तपेदिक

मुंबई, महाराष्ट्र – मुंबई में कामकाजी महिलाओं का जीवन कई बार संघर्षों से भरा होता है, खासकर जब वे असंगठित क्षेत्र में काम कर रही हों और उनका सामना ऐसी गंभीर बीमारियों से हो जो उन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पर हाशिए पर पहुंचा देती हैं। तपेदिक (टीबी) जैसी घातक बीमारी के साथ जीवन बिताने वाली महिलाएं अक्सर देखे और सुने नहीं जातीं, फिर भी वे अपने परिवारों का सहारा बनती हैं।

टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो फेफड़ों को प्रभावित करती है और यदि समय पर इलाज न हो तो यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। मुंबई जैसे महानगर में लाखों की संख्या में महिलाएं असंगठित क्षेत्र जैसे घरेलू काम, फेरीवाली, निर्माण कार्य आदि में काम करती हैं, जहां उनके स्वास्थ्य की देखभाल करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है।

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं न तो सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आती हैं और न ही उनके इलाज का खर्चा वहन कर पाने में समर्थ होती हैं। ऐसे में तपेदिक का इलाज कराना उनके लिए मुश्किल हो जाता है, जिससे बीमारी और गंभीर हो जाती है। इसके अलावा, इन महिलाओं पर आर्थिक दबाव इतना अधिक होता है कि वे अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दे पातीं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई में टीबी के मरीजों की संख्या में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है, लेकिन उनकी पहचान और उपचार के प्रयास अभी भी अपर्याप्त हैं। वे लगातार काम करती रहती हैं, बावजूद इसके कि उनके शारीरिक हालात सही नहीं हैं। महामारी के बाद स्थिति और भी दयनीय हो गई है क्योंकि स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित हो गई है।

सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा टीबी के उपचार के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, परन्तु असंगठित क्षेत्र की महिलाओं तक इन सुविधाओं का लाभ पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। प्रशिक्षण और जागरूकता अभियानों की कमी के कारण कई महिलाओं को रोग के लक्षण और उपचार के बारे में जानकारी नहीं हो पाती है।

मुंबई जैसे वैश्विक शहर में ऐसे काले सच को उजागर करना आवश्यक है ताकि नीति निर्माता और समाज इस ओर ध्यान दें। महिलाओं को स्वस्थ रहने और आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत है। केवल एक जोड़ी पैरों के सहारे जीवन यापन करने वाली ये महिलाएं समाज की अनदेखी धुरी हैं, जिन्हें आत्मनिर्भर बनने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए।

टीबी से ग्रस्त महिलाओं का समर्थन और उनके अधिकारों की रक्षा करना न केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में भी एक जरूरी कदम है। मुंबई में कामकाजी महिलाओं की इस कहानी को व्यापक स्तर पर समझना और समाधान निकालना अनिवार्य हो गया है।

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