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जब ईश्वर को आपकी फ़िल्म ठीक करनी पड़े | करप्पु – डीउस एक्स मशीना समझाया | FMM 21

चेन्नई, तमिलनाडु – फिल्मों में कथा कहने के दौरान कभी-कभी एडीटिंग या पटकथा लेखन में ऐसी तकनीकें अपनाई जाती हैं जिन्हें ‘डीउस एक्स मशीना’ कहा जाता है, जिसका मतलब है अचानक किसी दिव्य हस्तक्षेप द्वारा कहानी का समाधान कर देना। इस एपिसोड में हम चर्चा करेंगे कि क्यों इस तकनीक को अधिकांश दर्शक धोखा समझते हैं, फिर भी कुछ फिल्मों में यह प्रभावी ढंग से काम करता है।

‘डीउस एक्स मशीना’ का शाब्दिक अर्थ है ‘मशीन से देवता’, जो थिएटर के दौर से आती है जहां अचानक कोई देवता मंच पर उतार दिया जाता था जिससे समस्या का समाधान होता था। लेकिन आज इसे अक्सर पटकथा में एक कमजोर मोड़ के रूप में देखा जाता है जब कहानी बिना तार्किक समझ के अचानक सुलझा दी जाती है।

फिर भी ऐसी फिल्मों की भी कमी नहीं जिनमें यह तकनीक सफल रही है। जैसे ‘ब्रूस ऑलमाइटी’, ‘लायर लायर’ और ‘ओएमजी – ओह माय गॉड!’ ने इस उपकरण का उपयोग बेहद प्रभावी तरीके से किया है। इन फिल्मों में दैवीय हस्तक्षेप को हास्य और भावुकता के साथ पेश किया गया, जिससे दर्शकों के साथ एक जुड़ाव बना।

वहीं फिल्म ‘करप्पु’ ने इस विषय पर दर्शकों में मिलाजुला प्रतिक्रिया पैदा की है। कुछ लोगों ने इसे क्रिएटिव और नया माना, तो कुछ ने इसे कहानी को आसान बनाने वाली चाल। ‘करप्पु’ में डीउस एक्स मशीना का प्रयोग कहानी को एक नई दिशा देने और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने के लिए किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि डीउस एक्स मशीना तभी काम करता है जब वह कहानी के नैतिक और भावनात्मक ताने-बाने में सहजता से घुलमिल जाए, न कि केवल कहानी की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से खत्म करने के लिए। दर्शकों की स्वीकृति इस बात पर निर्भर करती है कि यह तकनीक किस तरह से प्रस्तुत की गई है।

अंततः, फिल्मों में इस तरह की कहानियां दर्शकों के लिए मनोरंजन के साथ-साथ नैतिकता और विश्वास की अलग-अलग परतों को समझने का अवसर भी प्रदान करती हैं। इसलिए यह जरूरी है कि फिल्म निर्माता इस तकनीक का उपयोग सोच-समझ कर और सटीक योजना के साथ करें ताकि कहानी में प्राकृतिक प्रवाह बना रहे।

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